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पितृ पक्ष 2018: पितृ दोष के लक्षण, कारण और उपाय

भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में मृत्यु और पुर्नजन्म की व्याख्या बहुत ही विस्तृत रूप से बताई गई है जिसके मुताबिक मृत्यु के बाद केवल शरीर नष्ट होता है,लेकिन आत्मा अमर रहती है। जो मृत्यु के बाद फिर से जीवन चक्र में और जन्म लेती है जिसे पुर्नजन्म कहा जाता है। पितृदोष की शुरूआत भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की प्रथमा से होती है और समाप्ति अमावस्या के अंतिम श्राद्ध से होती है।

आपको बता दें कि हिन्दू शास्त्रों में जीवित लोगों के साथ-साथ मृत व्यक्तियों को भी भोजन और तर्पण के जरिए मुक्ति दिलाने के बारे में बताया गया है। इसलिए आज हम आपको पितृदोष के लक्षण, कारण और उपचार के बारे में बताते हैं जिससे आप इसके असर से समय रहते ही बच सकें या कम कर सकें।

पितृदोष क्या होता है?

दरअसल अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद विधि विधान से अंतिम संस्कार न किया जाए या किसी की अकाल मृत्यु हो जाए तो व्यक्ति से जुड़े परिवार की कई पीढ़ियों को तक पितृदोष का दंश झेलना पड़ता है। इसके लक्षणों से मुक्ति के लिए जीवन भर उपाय करने की जरूरत होती है।

पितृ दोष के लक्षण :

1. संतान न होना, संतान हो तो विकलांग, मंदबुद्धि या चरित्रहीन अथवा होकर मर जाना।

2. नौकरी, व्यवसाय में हानि, बरकत न हो।

3. परिवार में एकता न होना, अशांति हो।

4. घर के सदस्यों में एक या अधिक लोगों का अस्वस्थ होना, इलाज करवाने पर ठीक न होना।

5. घर के युवक-युवतियों का विवाह न होना या विवाह में विलंब होना।

6. अपनों के जरिए धोखा मिलना।

7. दुर्घटनादि होना, उनकी पुनरावृत्ति होना।

8. मांगलिक कार्यों में विघ्न होना।

9. परिवार के सदस्यों में किसी को प्रेत-बाधा होना इत्यादि।

10. घर में हमेशा तनाव और कलेश रहना।

पितृ दोष के कारण :

1.पितरों का विधिवत् संस्कार, श्राद्ध न होना।

2. पितरों की विस्मृति या अपमान।

3. धर्म विरुद्ध आचरण।

4. वृक्ष, फल लदे, पीपल, वट इत्यादि कटवाना।

5. नाग की हत्या करना, कराना या उसकी मृत्यु का कारण बनना।

6. गौहत्या या गौ का अपमान करना।

7. नदी, कूप,तड़ाग या पवित्र स्थान पर मल-मूत्र विसर्जन।

8. कुल देवता,देवी, इत्यादि का अपमान करना।

9. पवित्र स्थल पर गलत कार्य करना।

10. पूर्णिमा,अमावस्या या पवित्र तिथि को संभोग करना या पूज्य स्त्री के साथ संबंध बनाना।

पितृ दोष के उपाय :

1. श्राद्ध पक्ष में तर्पण, श्राद्ध इत्यादि करें।

2. पंचमी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा को पितरों के निमित्त दान इत्यादि करें।

3. घर में भगवत गीता पाठ विशेषकर 11वें अध्याय का पाठ नित्य करें।

4. पीपल की पूजा, उसमें मीठा जल तथा तेल का दीपक नित्य लगाएं। परिक्रमा करें।

5. हनुमान बाहुक का पाठ, रुद्राभिषेक, देवी पाठ नित्य करें।

6. श्रीमद् भागवत के मूल पाठ घर में श्राद्धपक्ष में या सुविधानुसार करवाएं।

7. गाय को हरा चारा, पक्षियों को सप्त धान्य, कुत्तों को रोटी, चींटियों को चारा नित्य डालें।

8. ब्राह्मण-कन्या भोज करवाएं।

9. सूर्य को नियमित रूप से तांबे के पात्र से जल चढ़ाएं।

10. हर रविवार को घर में परिवार के सभी लोग गायत्री मंत्र से यज्ञ करें।

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