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मोदी- राहुल बिना कागज़ पढ़े 15 मिनट बोलकर दिखाएं, तो जनता बोली – आप गांधी का सही नाम बताकर दिखाये

राहुल बिना कागज़ पढ़े 15 मिनट बोलकर दिखाएं। राहुल बिना कागज़ पढ़े हिंदी, अंग्रेज़ी या इटैलियन में बोलकर दिखाएं.राहुल 15 मिनट में 5 बार विश्वेश्वरैया बोलकर दिखाएं – नरेंद्र मोदी

बच्चों की तरह ये चैलेंज कोई और नहीं देश के सबसे ज़िम्मेदार पद पर बैठा शख्स दे रहा है. ये बचकाने चैलेंज दरअसल उन गंभीर सवालों के जवाब हैं जो राहुल ने उठाए थे. राहुल गांधी ने कहा था कि मुझे 15 मिनट राफेल और नीरव पर बोलने दें तो प्रधानमंत्री सामने खड़े नहीं रह पाएंगे. बस, प्रधानमंत्री ने ना बोलने को नीरव चुना, ना राफेल. उन्होंने चुना 15 मिनट. मुझे उनकी यही बात पसंद है.वो जानते हैं कि उन्हें किस बात पर नहीं बोलना. इससे बढ़कर वो जानते हैं कि किस बात पर चकल्लस करके ज़्यादा ताली बटोरी जा सकती हैं. वही तो उन्हें चाहिए भी. अपने भक्तों की खुद से अपेक्षाओं को भगवन खूब समझते हैं. उन्हें पता है कि भक्तगण उनसे जवाब नहीं एंटरटेनमेंट चाहते हैं तो वही वो करते हैं।

वैसे अपने पीएम को बिना मांगी नसीहत देना चाहता हूं. कई बार कागज़ देखकर पढ़ना ज़्यादा ज़रूरी है. ये कोई यूनिवर्सिटी डिबेट कॉम्पीटिशन नहीं चल रहा है कि परची नहीं देखनी. ये हिंदुस्तानी सियासत का मामला है जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की ज़िंदगी और सपने जुड़े हैं. एक-एक वादा और एक-एक दावा पूरे ध्यान से किया जाना चाहिए ताकि लोग गुमराह ना हों. अगर आप कागज़ हाथ में लेकर भाषण पढे़ं तो तक्षशिला को पाकिस्तान की जगह भारत में बताने से बच सकते हैं, चंद्रगुप्त को मौर्य साम्राज्य की सूची से निकालकर गुप्त वंश की वंशावली में जोड़ने से बच सकते हैं, श्यामजी कृष्ण वर्मा की उपलब्धियों को श्यामा प्रसाद मुखर्जी के खाते में जोड़ने की चूक से बचकर बेवकूफ दिखने से बच सकते हैं, आज़ादी के वक्त डॉलर और रुपये की वैल्यू एक बताकर अपने साथ लोगों को गुमराह करने से भी बच सकते हैं. खुद ही सोचिए, कागज़ में पॉइन्टर्स लिखकर लाने के कितने लाभ हैं !!

वैसे सबसे ज़्यादा अचंभा तब हुआ जब साहेब कह रहे थे कि हम तो अच्छे कपड़े तक नहीं पहन सकते. उनकी बात सुनकर जनता परेशान है. वो सोच रही है कि क्या अब हमारे प्रिय परिधानमंत्री जी को दस लाख का सूट भी ढंग का कपड़ा नहीं लगता ?

खैर, गुजरात में सौ भी ना छू पाने के बाद अब चुहलबाज़ी करके भक्तों को रिझाना ही उनके पास एकमात्र ऑप्शन है, लेकिन मैं इसे बुरा नहीं मानता क्योंकि ये दंगे भड़काने से तो बेहतर ही है. फिर भी साहेब को उन लोगों का थोड़ा ख्याल रखना चाहिए जो अभी राजनीति को ज़रा सा गंभीर मानते हैं. सर्कस में जोकर का खेल देखकर सब हंसते हैं लेकिन बीच – बीच में कुछ सीरियस करतब भी हो जाएं तो भरोसा बना रहता है कि हमारा पैसा वसूल हो रहा है, वरना स्टैंडअप कॉमेडी करनेवाले तो मार्केट में अब खूब हैं. वो तो कागज़ भी नहीं देखते और अपने मन से इतिहास भी नहीं गढ़ते – नितिन ठाकुर

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