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क्‍या 24 घंटे के सीएम होंगे बीएस येद‍ियुरप्‍पा, बीजेपी की होगी क‍िरक‍िरी?

कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बन गई, बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री की शपथ भी ले ली, इस आधार पर कि पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। मगर अब तक बहुमत का आंकड़ा उनके पास नहीं है।हालांकि बहुमत जुटाने के लिए राज्यपाल ने 15 दिन का मौका दिया है। मगर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है। कोर्ट ने 112 विधायकों की सूची तलब की है। शुक्रवार(18मई) को सुनवाई भी है।अब तक बीजेपी 112 विधायकों की सूची जारी नहीं कर पाई है। बताया जा रहा है कि अगर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान बीजेपी 112 विधायकों की सूची पेश नहीं कर पाई तो सुप्रीम कोर्ट बीएस येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री पद से हटा सकती है।अगर ऐसा हुआ तो येदियुरप्पा सिर्फ 24 घंटे तक ही मुख्यमंत्री बने रह पाएंगे। इससे पहले जब पहली दफा 2007 में वह मुख्यमंत्री बने थे तो जेडीएस गठबंधन टूटने पर सिर्फ सात दिन कुर्सी तक बैठ सके थे।

बीजेपी की टेंशन बढ़ीः

222 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास 104, कांग्रेस के 78 और जेडीएस के 38 विधायक हैं। जबकि दो विधायक निर्दलीय हैं।बीजेपी को 112 की जादुई संख्या तक पहुंचने के लिए आठ विधायकों की दरकार है। पार्टी को दो निर्दलीयों का साथ मिलने की उम्मीद थी, मगर निर्दलीय विधायक जेडीएस-कांग्रेस के धरने में शामिल होते नजर आए। माना जा रहा के निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ नहीं जाना चाहते।सूत्र बता रहे कि बीजेपी जेडीएस-कांग्रेस में सेंधमारी की ताक मे थी, मगर यह आसान नहीं है। क्योंकि पहले से ऐसी आशंका को भांपते हुए कांग्रेस-जेडीएस अपने विधायकों को सुरक्षित रिजॉर्ट में ‘नजरबंद’ करने की तैयारी की है।जाहिर सी बात है कि बीजेपी इन विधायकों तक आसानी से नहीं पहुंच सकती। बीजेपी को कांग्रेस के करीब एक दर्जन लिंगायत विधायकों के समर्थन मिलने की उम्मीद रही। जेडीएस से गठबंधन के मुद्दे पर इन विधायकों के कांग्रेस से बगावत की खबरें थीं, मगर अब तक बीजेपी और लिंगायत विधायकों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन सका है।

दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस ने अपने पास बहुमत से ज्यादा सीटें होने का दावा किया है। राज्यपाल को 115 विधायकों की सूची सौंपने की बात सामने आ रही है। जबकि बहुमत के लिए 112 की संख्या ही काफी है।ऐसे में बहुमत का पेंच फंसा होने पर बीजेपी संकट का सामना कर रही है।

यूपी में जब रातों रात बने थे सीएम,फिर सुबह छिन गई कुर्सीः

कर्नाटक की तरह उत्तर प्रदेश में भी खंडित जनादेश के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर मारामारी मच चुकी है। 1998 में मुख्यमंत्री पद को लेकर रोचक वाकया सामने आया था।जब राज्य में 1996 में हुए चुनाव में खंडित जनादेश आया।अकेले कोई दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं दिखा तो राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। बाद में बीजेपी ने बसपा से गठबंधन कर सरकार बनाई थी।इस बीच बसपा ने समर्थन वापस लिया तो फिर कल्याण ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई और रिकॉर्ड 93 सदस्यीय मंत्रिमंडल बनाया। इस पर 21 फरवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया जगदंबिका पाल को शपथ दिला दी।आधी रात में बीजेपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अगले दिन दोपहर तीन बजे ही हाईकोर्ट ने जगदंबिका पाल के मुख्यमंत्री बनने की प्रक्रिया असंवैधानिक घोषित कर दी। फिर जगदंबिका पाल कोर्ट चले गए तो सुप्रीम कोर्ट ने कल्याण सिंह और जगदंबिका पाल को बराबर मानते हुए सदन में गुप्त मतदान से बहुमत का फैसला कराने का आदेश दिया।मतदान में कल्याण सिंह जीते और फिर मुख्यमंत्री बने।

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