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मोदी की नोटबंदी से न कालाधन खत्म हुआ, न देश कैशलेस हुआ और न भृष्टाचार कम हुआ – आरबीआई

मोदी की ‘नोटबंदी’ की पोल खुलने लगी है, इससे ना ‘कालाधन’ खत्म हुआ और ना ही देश ‘कैशलेस’ हुआ और न भृष्टाचार कम हुआ वो अब और दुगुना बढ गया है, POS मशीन ने 20 लाख लोगों का राशन छीना है।

रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों जो कन्जयूमर कॉन्फिडेंस सर्वे जारी किया है वह बता रहा है कि मुताबिक नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त के मुकाबले इन दिनों अर्थव्यवस्था से जुड़े सभी सेक्टर में बेहद निराशा की स्थिति पैदा हुई है, 2014 के मुकाबले ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो यह मानते हैं कि आर्थिक स्थितियां पहले से ज्यादा खराब हुई हैं नौकरियों के मोर्चे पर भी लोगों को निराशा ही हाथ लगी है।

मोदी सरकार की तारीफ करने वाले भाजपा नेताओं की आरबीआई के आंकड़ों ने पोल खोल दी है। आरबीआई द्वारा जारी किए गए सर्वे के अनुसार, देश में 48 फीसदी लोगों ने माना है कि पिछले दो सालों के मुकाबले इस साल देश की अर्थव्यवस्था खराब हुई है।

2015-16 में विकास दर 8.2 फीसदी थी जो 2017-18 में घटकर 6.7 फीसदी हो गई, चार वर्षों में एनपीए 2,63,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 10,30,000 करोड़ रुपये हो गया।

नोटबन्दी की सच्ची तस्वीर केंद्र सरकार तो नही बताएगी पर तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि 2017-18 के दौरान तमिलनाडु में 50,000 एमएसएमई इकाइयां बंद हो गईं, पांच लाख नौकरियां छिन गई अब एक स्टेट की यह हालत है तो आप खुद सोचिए कि पूरे देश मे नोटबन्दी के बाद क्या गदर मचा होगा।

नोटबन्दी की बात निकली है तो यह बताना भी समीचीन होगा कि आरबीआई द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक देश में इस समय जनता के पास नकदी का स्तर 19.3 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है। यह न सिर्फ अब तक का सबसे ज्यादा है, बल्कि नोटबंदी के बाद की स्थिति के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है जबकि नोटबंदी के 2 महीने बाद जनता के हाथ में नकदी घटकर 7.8 लाख करोड़ रुपए रह गई थी लेकिन आज इस समय चलन में कुल मु्द्रा 19.3 लाख करोड़ रुपए से अधिक है।

मई 2014 में मोदी सरकार के आने से पहले लोगों के पास लगभग 13 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा थी, एक वर्ष में यह बढ़कर 14.5 लाख करोड़ से अधिक और मई 2016 में यह 16.7 लाख करोड़ हो गई। अक्टूबर 2016 में यह 17 लाख करोड़ से अधिक हो गई।

यह आकंडे बता रहे हैं कि जिसे नोटबन्दी के समय काला धन कहा जा रहा था वह मोदी सरकार के समय ही बहुत तेजी के साथ बढ़ा और नोटबन्दी के डेढ़ वर्षो के उपरांत फिर उसी अनुपात में आ गया यह बात सिद्ध करती है कि नोटबन्दी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रही है जिस डिजिटल इंडिया की बात की जा रही थी जिस कैशलेस या लेसकैश इंडिया की बात की जा रही थी वह योजनाए रेत के महल की मानिंद धड़धड़ाते हुए गिर गयी हैं – गिरीश मालवीय

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